वीराने पथ पर,
अनुशासन की राह सजाये,
निकला यह दीवाना था,
मिला नहीं कुछ भी ऐसा,
जो बातों से आगे जाये,
सो सोचा,
बातों ही बातों को,
बातों से जोड़ा जाये,
ब्लॉगिंग देखी,
ब्लॉगिंग समझी,
टॉकिंग का मार्ग प्रशस्त हुआ...
... और बन गया
let's talk

Saturday, 4 October 2014

अबकी मेला बड़ा कठिन था

अबकी मेला बड़ा कठिन था
भीड़ बहुत थी शोर बहुत था
रावण सारे बहुत बड़े थे
राम कहीं बस छिपे खड़े थे

लीला करना पड़ा जटिल था
तीर राम का गुमसुम सा था
रावण वध की आई बारी
नेता ने वह बाजी मारी

तीर चलाना राम को जो था
वह भी नेता ने छीना था
रावण को रावण ने मारा
मौन रह गया मेला सारा

Saturday, 19 July 2014

हम गुमसुम से लगते हैं

अबकी बारी यह सावन
बेहद सूना-सूना है
तुम तो हो वैसी ही
हम गुमसुम से लगते हैं

झूले के बिन बरगद
बिल्कुल खाली सा है
काले मेघ बिना बारिश के
बेमतलब से लगते हैं

कपटी कागा बोल रहा
कोयल पर उसका कब्जा है
गरज-घुमड़ कर जाते बादल
बेमानी से लगते हैं

फूलों के खेतों पर
छाया घना कुहासा है
हरे-भरे ये वन उपवन
नकली जैसे लगते हैं

Friday, 16 May 2014

पग-पग वीरानी छायी है

प्रेम तुम्हारा कठिन सफ़र सा
नहीं मिल रहा कोई ठौर
मुझको ठुकराने से पहले  
कसम प्यार की खायी है 

वादों की देहरी पर बैठा 
ढूंढ रहा तुमको चहुँओर 
हमने तो बस तुममें ही
खुद की आहट पायी है

तुम तो चले गए बस यूं ही 
कैसे बढ़े ये जीवन डोर 
तुम बिन मैं कुछ भी नहीं 
पग-पग वीरानी छायी है 

Tuesday, 13 May 2014

कुछ तो है तुम में

कुछ तो है 
तुम में 
सबसे अलग 
सबसे ख़ास

सच कहता हूँ
तुम बिन
कुछ भी नहीं
जगत में 

सब कुछ
सूना-सूना है
बिलकुल ही
रीता-रीता है 

मुझे पता है
तुम्हें नहीं
परवाह मेरी
बिल्कुल भी 

फिर भी
ना जाने क्यों
मैंने बांधी
उम्मीदें तुमसे 

जाओ अब तुम
जी लूँगा मैं भी
टूटी उम्मीदों
बिखरे सपनों संग 

Thursday, 17 April 2014

आओ तुम्हें ले चलूँ

आओ तुम्हें ले चलूँ 
दूर कहीं 
पहाड़ों के पार 
जहाँ बस हम हों 
और हो तुम्हारी हँसी 

खुले बालों से कर सकूँ 
बादलों को महसूस 
और फिर हर सुबह 
कुछ टपकती बूँदें 
कराएं बारिश का एहसास 

तुम हंसो तो लगे 
बस अभी आया है सूरज 
बादलों को चीरकर 
मुझे तुमसे मिलाने 
सबको अकेला छोड़कर 

पर यह क्या
तुम तो जा रही हो 
अपने सब वादे तोड़कर 
बादल, बूँदें, बारिश, सूरज 
सबको यूँ ही छलकर  

Saturday, 22 March 2014

तेरे जाने की आहट से


तेरे जाने की आहट से
यूं लगा कि जैसे शाम ढली
पर पता नहीं चल पाया मुझे
अब सूरज निकलेगा नहीं

तुम बोले थे हंसकर मुझसे
आओगे फिर पास मेरे
पर पता नहीं चल पाया मुझे
हंसी तेरी अब और नहीं

तुम तो मेरी परछाई हो
यही हमेशा माना मैने
पर पता नहीं चल पाया मुझे
अब मैं खुद भी बचा नहीं

Tuesday, 11 February 2014

आज तुम्हारे लिए लिखूं कुछ

आज तुम्हारे लिए लिखूं कुछ
जो भी हो बस तुम जैसा
सीधा-सादा भोला-भाला
कुछ ज्यादा ही अपना सा

तेरा आना फिर छा जाना
कुछ वैसा लिखना चाहूँ
यादों की परछाईं गहरी
उसे मूर्त करना चाहूँ

तुम ही बस तुम ही तो हो
मेरे सपनों का अनावरण
तुमने मेरे जीवन में आकर
हटा दिए अंतस के आवरण