मेरा यह मौन
तुम्हारे मौन से छोटा है
कहीं लगता सच
कहीं यह मुखौटा है
मैंने कहा था
मान जाओ इस बार भी
हमेशा की तरह
जीत जाओ इस बार भी
पर तुम्हें तो
मुझे जिताने की जिद थी
हार कर भी
जीत जाने की हद थी
अब क्या करूँ मैं
जीतने की आदत नहीं है
तुमसे जीत कर
जश्न की ताकत नहीं हैं

