वीराने पथ पर,
अनुशासन की राह सजाये,
निकला यह दीवाना था,
मिला नहीं कुछ भी ऐसा,
जो बातों से आगे जाये,
सो सोचा,
बातों ही बातों को,
बातों से जोड़ा जाये,
ब्लॉगिंग देखी,
ब्लॉगिंग समझी,
टॉकिंग का मार्ग प्रशस्त हुआ...
... और बन गया
let's talk

Saturday, 17 November 2012

...या सब फ़साना ही था

तुमसे दूरी हो रही मुश्किल
पास आने की इजाजत ही नहीं
मुझे याद क्यों किया तुमने
जब बेदर्दी से भुलाना ही था

तुम्हारी यादों के समंदर में
ये लहरें बेतरतीब सी हैं
वायदों को कहा सच क्यूँ था
जब उन्हें झुठलाना ही था

मेरी नासमझी का सबब
तेरी समझदारी में छिपा
कोई रिश्ता भी था मुझसे
या बस बहाना ही था

आज बता ही दो तुम
मुझसे नजदीकियों में
हकीकत भी थी कुछ
या सब फ़साना ही था

2 comments:

  1. मेरी नासमझी का सबब
    तेरी समझदारी में छिपा
    .....zabaardast kataaksh..

    Aap to bahut achche kavi bhi hai, Sanjeev jee...

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