क्या कहूं तुमसे
अपना हमसफर
या फिर
यूं ही मिला कोई राह पर
समझना हो रहा मुश्किल
सच कहूं तुमसे
इस सफर में
दूर हूं
पर पास मेरे हो बहुत
तुम कर रहे व्याकुल
पूछ लूं तुमसे
वायदे थे ढेर भर
क्या हुए
सब गुम हुए पथ में
मन हो रहा विह्वल
बोल दूं तुमसे
उन वायदों संग
टूटे हैं
अरमानों के किले
थम सी गयी हलचल
लग रहा है कि घर से दूर रहा नहीं जा रहा , वेदना परिलिक्षित हो रही है !
ReplyDeleteप्रवीण